नक्षत्र परिचय : भारतीय ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का महत्व

भारतीय ज्योतिष में नक्षत्र (Constellation) का विशेष स्थान है। आकाश मंडल में असंख्य तारे हैं, लेकिन जब कुछ तारे एक विशेष आकृति में दिखाई देते हैं, तो उस तारा-समूह को नक्षत्र कहा जाता है। ये आकृतियाँ कभी अश्व, कभी शकट, कभी हाथ, कभी चक्र या त्रिकोण जैसी प्रतीत होती हैं। इन्हीं आकृतियों के आधार पर प्राचीन भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने नक्षत्रों के नाम निर्धारित किए, जैसे अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि।

हमारा सूर्य भी एक देदीप्यमान तारा है। सूर्य की तरह सभी नक्षत्र स्वयं प्रकाशमान होते हैं, अर्थात् वे ग्रहों की तरह किसी अन्य तारे से प्रकाश ग्रहण नहीं करते। यह बात astronomy और astrology दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

आकाश मंडल, भचक्र और नक्षत्रों की गणना

जिस प्रकार पृथ्वी पर दो स्थानों के बीच की दूरी किलोमीटर या मील में मापी जाती है, उसी प्रकार सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की दूरी और स्थिति को समझने के लिए नक्षत्रों को मापदंड माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में नक्षत्रों की संख्या असंख्य बताई गई है। स्कंद पुराण के अनुसार नक्षत्रों की संख्या अस्सी समुद्र, चार अरब और बीस करोड़ बताई गई है।

हालाँकि, आधुनिक खगोल शास्त्र (Modern Astronomy) और अथर्व संहिता आदि ग्रंथों में क्रांतिवृत्त के दोनों ओर 9-9 अंश में स्थित 88 प्रमुख नक्षत्रों को मान्यता दी गई है। इनमें से भारतीय ज्योतिष ने 27 या 28 नक्षत्रों को विशेष रूप से स्वीकार किया है, क्योंकि सूर्य, चंद्र और ग्रह इन्हीं नक्षत्रों के प्रभाव क्षेत्र में भ्रमण करते हैं।

27 और 28 नक्षत्रों की अवधारणा

भारतीय ज्योतिष में गणितीय दृष्टि से मुख्यतः 27 नक्षत्रों को स्वीकार किया गया है। 28वाँ नक्षत्र अभिजित माना जाता है, लेकिन यह क्रांतिवृत्त से कुछ दूर होने के कारण सामान्यतः कम प्रयोग में लाया जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से मुहूर्त शास्त्र में शुभ कार्यों के लिए किया जाता है।

भचक्र के कुल 360 अंश होते हैं। जब इन्हें 27 नक्षत्रों में विभाजित किया जाता है, तो प्रत्येक नक्षत्र का मान 13 अंश 20 कला होता है। यह गणना ज्योतिषीय विश्लेषण की नींव मानी जाती है।

चंद्र नक्षत्रों का विशेष महत्व

भारतीय ज्योतिष में चंद्र नक्षत्रों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि चंद्रमा मन का स्वामी है और पृथ्वी के सबसे निकट होने के कारण उसका प्रभाव मानव जीवन पर अधिक पड़ता है। चंद्रमा अपनी तीव्र गति के कारण लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार कर लेता है, जबकि सूर्य को एक नक्षत्र पार करने में लगभग 13-14 दिन लगते हैं।

मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु की गति अलग-अलग होने के कारण नक्षत्रों में उनका गोचर (Transit) अलग समय में होता है। लेकिन प्रत्येक स्थिति में नक्षत्र का मान 13°20′ ही रहता है। यही कारण है कि astrology calculations में नक्षत्रों की भूमिका अत्यंत अहम हो जाती है।

27 नक्षत्रों के नाम और तारा संख्या

सत्ताईस (27) नक्षत्रों में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती शामिल हैं।

इन नक्षत्रों के साथ जुड़े तारों की संख्या अलग-अलग होती है, जैसे शतभिषा में 100 तारे माने गए हैं, जबकि स्वाती और चित्रा में केवल एक-एक तारा माना जाता है। यह वर्गीकरण ancient Indian astronomy की गहराई को दर्शाता है।

नक्षत्रों का स्वरूप और उनसे संबंधित देवता

प्रत्येक नक्षत्र की एक विशिष्ट आकृति मानी गई है, जैसे कृत्तिका छुरे के समान, रोहिणी शकट के समान, हस्त हाथ के समान और मूल सिंह की पूँछ के समान मानी जाती है। इन्हीं आकृतियों के आधार पर नक्षत्रों के देवता निर्धारित किए गए हैं।

उदाहरण के लिए, अश्विनी के देवता अश्विनी कुमार, भरणी के यम, कृत्तिका के अग्नि, रोहिणी के ब्रह्मा, मृगशिरा के चंद्रमा और आर्द्रा के रुद्र (शिव) माने गए हैं। यह symbolism भारतीय ज्योतिष को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।

नक्षत्रों का राशियों में विस्तार

अश्विनी नक्षत्र के प्रथम बिंदु से लेकर प्रत्येक नक्षत्र का गणितीय विस्तार 13 अंश 20 कला ही होता है। प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष राशि के भाग में स्थित होता है और उसी के अनुसार उसका प्रारंभ और समाप्ति काल निर्धारित होता है।

यही गणना फलित ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि जन्म नक्षत्र के आधार पर ही जातक की दशा, स्वभाव और जीवन के प्रमुख घटनाक्रमों का अनुमान लगाया जाता है।

आकाश मंडल में नक्षत्रों की स्थिति

आकाश मंडल में कुछ नक्षत्र उत्तर दिशा में दिखाई देते हैं, कुछ मध्य में और कुछ दक्षिण दिशा में। उदाहरण के लिए अश्विनी, भरणी, स्वाती और विशाखा जैसे नक्षत्र उत्तर दिशा में दिखाई देते हैं, जबकि कृत्तिका, रोहिणी, पुष्य और श्रवण जैसे नक्षत्र आकाश के मध्य भाग में दृष्टिगोचर होते हैं।

यह वर्गीकरण sky observation और traditional astrology दोनों के लिए उपयोगी माना जाता है।

काल पुरुष और नक्षत्रों का संबंध

प्राचीन भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने काल पुरुष की कल्पना की है, जिसमें 27 नक्षत्रों को मानव शरीर के विभिन्न अंगों से जोड़ा गया है। जैसे कृत्तिका को सिर, रोहिणी को मस्तक, मृगशिरा को भौंह, आर्द्रा को आँख, पुनर्वसु को नाक और पुष्य को मुख से जोड़ा गया है।

यदि किसी जातक के जन्म नक्षत्र पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो उसी अंग से संबंधित कष्ट होने की संभावना बताई जाती है। यह concept ज्योतिष को practical और predictive बनाता है।

नक्षत्रों के स्वामी ग्रह और दशा चक्र

सभी 27 नक्षत्रों के नौ (9) स्वामी ग्रह माने गए हैं — केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध। जातक के जन्म नक्षत्र के स्वामी ग्रह से ही उसकी महादशा का आरंभ होता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी का जन्म नक्षत्र पुनर्वसु है, तो उसकी दशा गुरु से प्रारंभ होगी। यही Vimshottari Dasha System भारतीय ज्योतिष की सबसे प्रचलित दशा पद्धति है।

निष्कर्ष (Conclusion)

नक्षत्र केवल तारा-समूह नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय ज्योतिष की आत्मा हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन के हर चरण में नक्षत्रों का प्रभाव माना गया है। यही कारण है कि मुहूर्त, विवाह, संतान, यात्रा और अन्य शुभ-अशुभ कार्यों में नक्षत्रों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

आज modern science भी यह स्वीकार करती है कि प्राचीन भारतीय आचार्यों की नक्षत्र संबंधी गणनाएँ अत्यंत सटीक और वैज्ञानिक थीं। नक्षत्रों का यह ज्ञान न केवल astrology lovers के लिए, बल्कि भारतीय संस्कृति को समझने वालों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।

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